सदा उत्साहित रहने के उपाय

(प्रेरणा पुस्तक से – डॉक्टर स्वामी देवव्रत सरस्वती)

सदा उत्साहित रहने के उपाय किसी कार्य को करने का जोश , उमंग , होंसला उत्साह कहलाता है । लक्ष्मी ऐसे पुरुष का ही वरण करती है ।

उत्साह सम्पन्नमदीर्घ सूत्रं क्रिया विधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम् । शूरं कृतज्ञं दृढ़सौहृदंच लक्ष्मी स्वयं याति निवास हेतोः ।।

जो सदा उत्साहित रहता है , कार्य को लटकाता नहीं है , कार्य करने की विधि को जानता है , जिसमें किसी प्रकार का दुर्व्यसन नहीं है , शूरवीर किये हुये उपकार को मानने और जिसकी मित्रता दृढ़ है ऐसे पुरुष के यहाँ लक्ष्मी स्वयं निवास करने के लिये आती है । उत्साहित रहने के लिये निम्न सूत्र उपयोगी हैं

१. किसी भी परिस्थिति को हँसते हुये स्वीकार करना । जीवन में सुख – दु:ख , विघ्न , बाधायें आती ही रहती हैं । जिन्हें देख कर कुछ लोग अच्छे कार्य को प्रारम्भ ही नहीं करते परन्तु जो शूरवीर हैं वे जिस कार्य को प्रारम्भ कर देते हैं उसे पूरा करके ही दम लेते हैं ।

वह पथ क्या पथिक कुशलता क्या जिसमें बिखरे हुये शूल न हों ।

नाविक की धैर्य परीक्षा क्या जब धारा ही प्रतिकूल न हों ।


प्रसन्नता पूर्वक कार्य करने वालों की कठिनाईयां अपने आप • सुलझती जाती हैं । अंग्रेजी में कहावत है- well begin is half done .

२. आशावादी दृष्टिकोण रखना

नर हो न निराश करो मन को काम करो कुछ काम करो । धैर्य न टूटे पड़े चोट सौ घन की , यही अवस्था होनी चाहिये निजमन की ।

कांच का गिलास आधा पानी से भरा हुआ है । निराशावादी उसे आधा खाली और आशावादी आधा भरा हुआ बतलायेगा । एक परिवार में एक युवक , उसकी बहिन और माता तीन व्यक्ति थे । युवक निराशा वादी था । उसने कहा माँ हम तीन ही हैं । माँ ने कहा अरे पगले ! तेरी शादी होने पर बहू घर में आयेगी तो चार हो जायेंगे चिन्ता क्यों करता है । युवक ने कुछ विचार कर कहा फिर मेरी बहिन की शादी हो जायेगी और हम तीन ही रह जायेंगे । माँ ने आश्वासन देते हुये कहा – तेरे ने पुत्र भी तो होगा निराशावादी पुत्र ने कहा – माँ फिर तुम्हारे जाने का समय हो जायेगा । ऐसे निराशावादी युवक को कौन समझा सकता है ।

३. समाज में प्रतिष्ठित व्यक्तियों से प्रेरणा लें-

समाज में कुछ व्यक्ति ऐसे भी मिलेंगे जिन्होंने अपने पुरुषार्थ से प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त किया है । जिस व्यक्ति के कार्य से आप प्रभावित हैं उसी को अपना आदर्श मान कार्य में जुट जायें । महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़े ।

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती । कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।

४. अधिक महत्त्वाकांक्षी न बनें

यद्यपि बड़ा लक्ष्य बनाना कोई बुरा नहीं है । परन्तु याद रखें – शेखचिल्ली के समान सपने देखना उपहास का पात्र बनना है । कोई बड़ा कार्य करना है तो उसे टुकड़ों में बाटं कर करें । जब कार्य का एक भाग पूरा हो जाये तो फिर दूसरा – तीसरा करने से बड़ा कार्य भी आसान हो जायेगा । किसी भी कार्य की योजना बनाते समय अपनी क्षमता , संसाधन और सहायकों का मूल्यांकन कर लेने से सफलता की अधिक सम्भावना रहती है ।

५. वर्तमान में जीयें-

भूतकाल से शिक्षा लेकर वर्तमान में कार्य करते हुये भविष्य बनायें । जो व्यतीत हो चुका वह समय अब आना नहीं है । इसलिये उसके लिये शोक करना या चिन्तित होना व्यर्थ है । अभी जो आगे आने वाला है उस समय परिस्थितियाँ जैसी रहेंगी वैसा विचार कर लिया जायेगा । आपके सामने वर्तमान है वही आपका है । उसे ही सुखद , सुन्दर सुव्यवस्थित बनाने का प्रयत्न करें । प्रतिदिन प्रात : यह चिन्तन करें । कि आज का दिन बहुत ही अच्छी प्रकार से व्यतीत होगा ।

६. तनाव रहित रहें-

तनाव व्यक्ति और वातावरण के मध्य होने वाली क्रिया और प्रतिक्रिया को कहते हैं । कुछ सीमा तक तनाव हमें परिस्थितियों

से संघर्ष करने का सामर्थ्य प्रदान करता है और कर्त्तव्य के प्रति जागरूक भी करता है । परन्तु जब तनाव हर समय बना रहे तब उसका दुष्प्रभाव शरीर एवं मस्तिष्क दोनों पर पड़ता है । इसे कम करने के लिये प्रतिदिन व्यायाम आसन , प्राणायाम , खेल , ध्यान – धारणा एवं मनोरंजन के लिये समय निकालें । आज का काम कल पर न छोड़ें ।

७. अपने भाग्य की सराहना करें

व्यक्ति अपने से बड़ों के धन ऐश्वर्य एवं पद – प्रतिष्ठा को देख दुःखी होता है कि मेरे पास इतने साधन क्यों नहीं हैं उसे यह भी देखना चाहिये कि मेरे से नीचे स्तर के बहुत सारे लोग हैं और वे भी आराम से जीवन जी रहे हैं तो फिर मुझे तो परमात्मा ने उत्तम बुद्धि , स्वास्थ्य एवं अन्य सुख – सुविधायें प्रदान की है । मैं अपने भाग्य को दोष क्यों दूँ कि मुझे वह नहीं मिला । यदि किसी व्यक्ति के । जीवन में गहराई से विचार करें तो पता चलेगा कि जितना हम समझते हैं वह भी उतना सुखी नहीं है ।

८. नकारात्मक वातावरण से दूर रहें-

हमें मनुष्य जन्म शुभ कर्म करने और सुख , आनन्द की प्राप्ति के लिये मिला है । जो लोग निराशा की बात करते हैं वे जीवन संग्राम में असफल रहें हैं । उनके साथ रहने से आपका उत्साह , ऊर्जा और उमंग क्षीण हो जायेगी । हँसते और प्रसन्न रहने वाले के साथ सभी रहना चाहते हैं और रोनी सूरत वालों के समीप कोई भी नही भटकता । जहाँ का वातावरण नकारात्मक लोगों से घिरा है उससे दूर रहना ही अच्छा है ।


९ . मोटापा न बढ़ने दें –

शरीर में चर्बी बढ़ जाने पर व्यक्ति की कार्यशक्ति कम हो जाती है । आलस्य , निद्रा घेर लेते हैं । अनेक रोग भी डेरा जमा लेते हैं । इनके निवारण करने के लिये प्रतिदिन व्यायाम भ्रमण और भोजन पर नियन्त्रण करना आवश्यक है ।

१०. दूसरों का सम्मान करें-

प्रत्येक व्यक्ति सम्मान चाहता है । आप दूसरों का सम्मान करेंगे तो आपको भी सम्मान ही मिलेगा । आम बोने वाले को आम और बबूल लगाने वाले को कांटे ही मिलेंगे । किसी के जो वास्तविक गुण हैं उनकी चर्चा दूसरों के सामने अवश्य करें ।

11 सेवा कार्यों में सहयोग करें।

किसी जरूरत वाले व्यक्ति के कार्य में सहयोग देना सेवा कहलाता हैं । सेवा मानव को मानव से जोड़ने वाली कड़ी है । रोगी को औषध देना , साधन हीन बच्चों को संसाधन उपलब्ध कराना , पढ़ाना वृद्ध पुरुषों की सहायता , राष्ट्रीय आपदा में योगदान आदि बहुत से कार्य हैं जिनके करने से मन को शान्ति मिलती है ।

१२. ईश्वर चिन्तन करना-

अपना कुछ समय निकालकर प्रात : सायं ईश्वर चिन्तन करें । ईश्वर आनन्द स्वरूप है और प्रत्येक अच्छे कार्य में सहायता करता है । वह अशरण का शरण और शान्ति का धाम है । जैसे आप दूसरे व्यक्तियों से बात करते हैं वैसे ही अपने मन की बात ईश्वर के समक्ष रखिये और समाधान करने की प्रार्थना कीजिये ।

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प्रेरणा – डॉक्टर स्वामी देवव्रत सरस्वती

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