प्रेरणा

१. प्रेरणा ( Motivation )

प्रेरणा अग्नि की उस चिंगारी के समान है जो काले कोयले को प्रज्वलित कर दहकता अंगारा बना देती है । बन्दूक का वह घोड़ा ( ट्रिगर ) है जिसके दबा देने से गोली अपने लक्ष्य को बेंध देती है । प्रेरणा वह विद्युत् ऊर्जा है जो निष्क्रिय व्यक्ति में भी साहस का संचार कर उसे सर्वाग्रणी बना देती है । प्रेरणा व्यक्ति की प्रसुप्त शक्ति को उद्बुद्ध कर उसकी अन्तरात्मा को जीवन संग्राम में विजय पथ का पथिक बना उसे प्रथम पंक्ति में खड़ा कर देती है ।

सीता की खोज में वानर वीरों की टोली खड़ी है । आगे समुद्र उनका उपहास कर रहा है । इसे पार कर लंका में सीता को ढूढ़ने के लिये किसका साहस है । सभी इस चुनौती को सुन मौन साधे खड़े हैं । अन्त में जाम्बवन्त ने कहा- हनुमान् मैं वृद्ध होने के कारण लंका तक जा सकता हूँ परन्तु लौट कर आने का सामर्थ्य मुझ में नहीं है । तुम युवा हो इसलिये अपनी शक्ति को पहचान कर इस परीक्षा की घड़ी में आगे बढो और हनुमान् ने समुद्र में छलांग लगा दी ।

कौरव और पाण्डवों की सेना कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने – सामने खड़ी हैं । रणचण्डी अपना खप्पर भरने की प्रतीक्षा कर रही है । दोनों और शंख और रण वाद्य बज रहे हैं । यह दृष्य देख अर्जुन को व्यामोह ने घेर लिया और वह धनुष बाण को छोड़ रथ के कूबर पर बैठ गया । इस दृष्य को देख सभी हतप्रभ हैं । पाण्डव कि कर्त्तव्य विमूढ़ हो गये हैं । इस समय सारथि बने श्री कृष्ण ने अर्जुन को धीर बन्धाते हुये कहा – हे अर्जुन ! यह आत्मा अजर – अमर है जिसे अग्नि जला नहीं सकती । वायु सुखा नहीं सकता और पानी गला नहीं सकता । ये कौरव अपने पाप के कारण पहले ही मरे हुये हैं । तुम तो केवल निमित्त मात्र हो । यदि तुम जीते तो सारी भूमि पर राज्य करोगे और रण भूमि में मारे गये तो स्वर्ग की प्राप्ति होगी इसलिये उठो और युद्ध के लिये तैयार हो जाओ ।

प्रेरणा के दो प्रकार हैं

१ बाह्य प्रेरणा

२ आन्तरिक प्रेरणा

बाह्य प्रेरणा के भी तीन भेद हैं

१. भय के कारण प्रेरित होना जैसे परीक्षा में असफलता के भय से छात्र पढ़ने में प्रवृत्त होते हैं । किसी विभाग या कारखानों में कार्य करने वाले कर्मचारी इसलिये सतर्क रहते हैं कि कहीं हमें निष्कासित न कर दिया जाये । कहा भी है – भय बिन प्रीति न होय गोपाला ।

२. प्रोत्साहन – धन की प्राप्ति , पदोन्नति एवं मान सम्मान के लिये भी व्यक्ति किसी कार्य के लिये प्रेरित होता है अथवा उसे प्रेरित किया जा सकता है । संस्कृत में लोकोक्ति है – स्वार्थमनुदिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते । बिना स्वार्थ के मन्दबुद्धि भी किसी कार्य में प्रवर्तित नहीं होता ।

३. परिस्थिति – कई बार ऐसी परिस्थिति बन जाती है कि उसका सामना करने के लिये लोग आलस्य , प्रमाद को त्याग साहस के साथ उसका सामना करने को खड़े हो जाते हैं । इस स्थिति में बाह्य और आन्तरिक दोनों प्रकार की प्रेरणा देखी जाती है ।

बाह्य प्रेरणा के लाभ एवं हानि –

१. भय के कारण व्यक्ति सावधान होकर अपने कर्त्तव्य का पालन करता है ।

२. कार्य समय पर हो जाने से उत्पादन बढ़ जाता है ।

३. व्यक्ति की कार्य क्षमता बढ़ जाती है । परन्तु यह प्रेरणा तभी तक प्रभावित करती है जब तक ऊपर से दबाव हो । दबाव हटते ही प्रेरणा भी चली जाती है ।

हानियाँ

१. भय एवं दबाव के वातावरण में कार्य करने वालों में तनाव बढ़ता है ।

२. केवल दण्डे के बल कार्य करने वालों की रचनात्मक क्षमता समाप्त हो जाती है ।

३. कार्य की क्षमता कम हो जाने से अन्त में उत्पादन गिर जाता है । क्योंकि कर्मचारी अनमने ढंग से कार्य करते हैं । स्वत : प्रेरित होकर नहीं ।प्रोत्साहन वाली प्रेरणा तभी तक बनी रहती है जब तक व्यक्ति में कुछ पाने की इच्छा रहे । जैसे एक व्यक्ति ने गधे पर सब्जी लाद रखी थी । उसे कुछ ऊँचाई पर चढ़ना था जिसे देख गधा ठिठक गया । उसके स्वामी ने एक गाजर निकाली और उसे खाने के लिये गधा आगे बढ़ गया । अब यदि गधा भूखा नहीं है तो वह गाजर खाने के लिये लालायित होगा ही नहीं । प्राय : देखा जाता है । कि कर्मचारी अपना कोटा पूरा करने के पश्चात् कार्य रोक देते है ।

२. आन्तरिक प्रेरणा

इसका उद्गम व्यक्ति के भीतर स्वतः ही होता है । जिस में आस्था की प्रधानता रहती है । इसमें चिन्तन की दिशा बदल जाती है । व्यक्ति आत्म विश्वास के साथ स्वत : ही अपने कार्य में संलग्न रहता है । इसके लिये निम्न उपाय हैं –

१. आन्तरिक प्रेरणा के लिये सर्वप्रथम भय , संकोच एवं आलस्य को त्याग आत्म विश्वास , उत्साह एवं पुरुषार्थ से आगे बढ़ें ।

२. एक समय एक ही लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करें ।

३. महापुरुषों के प्रेरक जीवन चरित्रों का प्रतिदिन कुछ समय अध्ययन करना चाहिये ।

४. इस कार्य के लिये आडियो , वीडियो की सहायता ली जा सकती है ।

५. ऐसे मित्र बनायें जो स्वयं भी उन्नति के पथ पर अग्रसर हो और आपको भी प्रेरित करें । सप्ताह में एक दो बार उनसे अपने कार्य को आगे बढ़ाने के लिये उनसे परामर्श करें ।

६. ईश्वर प्रत्येक व्यक्ति को शुभ कार्य करते समय आनन्द उत्साह के भाव भाव और अशुभ कार्य में भय , शंका , लज्जा के भाव प्रकट करता है । भाव और अशुभ गलत कार्य करते समय हृदय की गति बढ़ जाती है । ऐसा प्रतीत होता है कि कोई हमें इस कार्य को करने से मना कर रहा है । यह ईश्वर की ओर से वर्जना है । परन्तु जिनका चित्त शुद्ध है उन्हीं को यह प्रेरणा स्पष्ट रूप से होती है । मलिन चित्त और पाप कर्म में आसक्त रजोगुणी लोगों को यह प्रेरणा अधिक प्रभावित नहीं करती । जैसे मलिन दर्पण में मुख साफ दिखाई नहीं देता ।

प्रेरणा क्यों आवश्यक है ?

१. प्रेरणा आपके आत्म विश्वास को जाग्रत कर देती है । व्यक्ति की समस्त ऊर्जा एक ही स्थान पर केन्द्रित हो जाती है ।

२. यह जीवन की गाड़ी को आगे बढाती है और सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है । जैसे इंजिन रेल गाड़ी को आगे खींचता है वैसे ही प्रेरणा व्यक्ति को जीवन पथ पर आगे बढ़ने का मार्ग बतलाती रहती है ।

प्रेरणा में बाधक तत्त्व

अनावश्यक आलोचना

२. अपमान

3 जब उचित पात्र के स्थान पर कुपात्र को सम्मान मिलता है तब अच्छे कार्य करने वालों का उत्साह मन्द पड़ जाता है ।

इनके निवारणार्थ –

१. किसी अच्छे कार्य के लिये प्रोत्साहन दें

२. उन्हें सम्मानित करें ।

३. दूसरों की सहायता करें परन्तु वे अपना कार्य स्वयं ही पूरा करें इसका ध्यान रखें ध्यान रखें।

प्रेरणा – स्वामी देव व्रत सरस्वती

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