अच्छे वक्ता कैसे बने

(प्रेरणा पुस्तक से – डॉक्टर स्वामी देवव्रत सरस्वती )

अच्छे वक्ता कैसे बनें ? व्याख्यान देना एक कला है । कुछों में यह जन्मजात होती है और कुछ अभ्यास द्वारा इसके पारंगत हो जाते हैं । जो शब्द हृदय से निकलते हैं उन्हीं का प्रभाव श्रोताओं पर पड़ता है ।

१. अपने विषय की तैयारी करके जायें-

आपको जिस विषय पर बोलना है उसकी पूरी तैयारी करें । विषय से सम्बन्धित आंकड़े , प्रमाण और उसका महत्त्व क्या है इन सबको अपने व्याख्यान में सम्भिलित करें । जिस प्रकार के श्रोता हों उसी विषय पर बोलने ने श्रोता ध्यान से सुनते हैं । श्रोताओं में भी कई वर्ग के लोग होते हैं । अच्छा वक्ता सभी की रुचि को ध्यान में रख कर बोलता है । अपने विषय के संक्षिप्त नोट , बिन्दु या आंकड़े कागज पर लिख लें । इससे आप विषयान्तर नहीं होंगे और जो बातें कहना चाहते हैं वे भली भाँति कही भी जा सकेंगी ।

२. आत्मविश्वास –

वक्ता की सफलता में उसका आत्मविश्वास सब से अधिक सहयोगी होता है । प्रारम्भ में मंच पर खड़े होने पर भय या संकोच होता है । कुछों के पैर भी कांपने लगते हैं । इसके निवाराणार्थ विषय की पहले से तैयारी और एकान्त में अथवा आदम कद दर्पण के सामने खड़े होकर अथवा वृक्षों वाले स्थान पर खड़े होकर वृक्षों को श्रोता मान कर बोलने का अभ्यास कर लिया जाये तो झिझक दूर हो जाती है । बोलना सभी को आता है । केवल किसी विषय को सीमित शब्दों में प्रस्तुत करने की आवश्यकता है । जो भाषा आप को आती है उसी में स्वाभाविक रूप में बोलें । अधिक शब्द जाल में पड़ने की आवश्यकता नहीं है ।

३. वेशभूषा –

अच्छी वेशभूषा सभी को प्रभावित करती है । वेशभूषा सभ्य समाज और अवसर के अनुरूप ऐसी होनी चाहिये जो शालीनता की परिचायक हो । कुछ वक्ता अपनी निश्चित वेशभूषा में ही आते हैं और कुछ जैसी सभा है उसके अनुसार वेशभूषा धारण करते हैं । परन्तु बार – बार वेश भूषा परिवर्तित करना अथवा अपने को आधुनिकतम प्रदर्शित करना वक्ता के अस्थिर विचारों का ही प्रतीक है ।

४. भावों की अभिव्यक्ति –

वक्ता के खड़े होने का ढंग , हाथ के संकेत एवं हाव भाव प्रदर्शित करना श्रोतागण को बहुत आकर्षित करता है । इससे भाषण में सजीवता आ जाती है । परन्तु आवश्यकता से अधिक हाथ हिलाना तथा अन्य किसी प्रकार की भाव भंगिमा अटपटी सी लगती है । जहाँ तक हो सके बोलना इस प्रकार चाहिये कि सभी श्रोताओं का ध्यान वक्ता की ओर रहे ।

५. व्याख्यान की शैली –

प्रत्येक वक्ता की अपनी विशिष्ट शैली होती है । कुछ अपने व्याख्यान में उतार – चढ़ाव करते हुये लोगों को आन्दोलित करते हैं । कुछ उन्हें रुलाने या हंसाने में सिद्धहस्त होते हैं । कुछ ऊँची आवाज में गरजते हैं और कुछ शान्त भाव से अपनी बात श्रोताओं के गले उतार देते हैं । वक्ता किसी भी पद्धति से बोले , उसका प्रयत्न यह होना चाहिये कि श्रोतागण उसके वक्तव्य को सरलता से समझ सकें । व्याख्यान को रोचक शैली में दिया जाये तो लोग ऊबते नहीं हैं ।

६. बिना देखे भाषण देना-

भाषण तभी प्रभावशाली बनता जब वक्ता और श्रोता दोनों ध्यान से सुनें सुनावें । जब कोई वक्ता व्याख्यान को लिखित रूप में पढ़ता हैं तो उसका और श्रोताओं का सम्बन्ध विच्छेद हो – जाता है । इसलिये जहाँ तक हो सके भाषण मौखिक ही देना चाहिये । विषयान्तर न हों इसके लिये महत्त्वपूर्ण बिन्दु नोट किये जा सकते हैं । जहाँ सामने टेबल न ही वहाँ कागज देखना अच्छा नहीं माना जाता ऐसी स्थिति में वक्ता को उन बिन्दुओं को स्मरण करके आना चाहिये ।

७. भाषा का ज्ञान –

भाषा के द्वारा ही वक्ता का संदेश जनता तक पहुंचता है । वक्ता की भाषा परिमार्जित , संयत और सरल होनी चाहिये । उसे किसी पर व्यक्ति गत कटाक्ष , उपहास या लांछन , अथवा आरोप न लगाकर इस विधि से अपनी बात कहनी चाहिये । कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे । वक्ता को आत्म प्रशंसा से भी बचना चाहिये । इसी भाँति आत्म कथा , किस्से , कहानी सुनाने से भी श्रोता ऊब जाते हैं । कभी – कभार कोई छोटा व्यंग चुटकुला , दोहा , शेर , श्लोक आदि प्रसंग वश सुनाने से व्याख्यान रोचक बन जाता है । यदि वक्ता किसी ऐसे स्थान पर जाता है जहाँ उसकी भाषा को कम लोग समझते हों तो उसे स्थानीय लोगों की भाषा के कुछ वाक्य , शब्द आदि अवश्य ही बोलने चाहियें तथा व्याख्यान घीमी गति से सरल शब्दावली में देने का प्रयत्न करना चाहिये । व्याख्यान में एक ही बात को बार बार नहीं दोहराना चाहिये ।

८. अवसर के अनुरूप व्याख्यान –

कोई विषय कितना भी प्रामाणित और सैद्धान्तिक हो फिर भी वह योग्य वक्ता की अपेक्षा करता है । अच्छा वक्ता राई को पहाड़ बना सकता है और अयोग्य वक्ता की अच्छी बात भी तुच्छ बन कर रह जाती है ।

नीकी पे फीकी लगे बिन अवसर की बात । जैसे बरणत युद्ध में श्रृंगार नहीं सुहात ॥

जब युद्ध का प्रयाण गीत चल रहा हो उस समय शृंगार रस का वर्णन शोभा नहीं देता । इसी भाँति उचित अवसर पर कुछ हलकी बात भी अच्छी लगती है ।

फीकी पे नीकि लगे कहिये सोच विचारी । सबको मन हर्षित करे ज्यों विवाह में गारी ।।

विवाह के अवसर पर सामान्य हास – परिहास भी सबको हर्षित कर देता है । यदि पूर्व वक्ता की बातों से आप सहमत नहीं है तब भी शालीनता से उसका प्रतिवाद करना चाहिये ।

९ . प्रश्नोत्तर की तैयारी-

वक्ता को यह मानकर मंच पर खड़ा होना चाहिये कि मैं बुद्धिमान् लोगों के समक्ष व्याख्यान दे रहा हूँ । हो सकता है कि बाद में कुछ लोग मुझ से प्रश्न पूछ लें । कुछ श्रोता व्याख्यान के बीच में ही प्रश्न पूछने के लिये खड़े हो जाते हैं । उनसे विनम्रता से कहा जाये कि व्याख्यान समाप्त होने पर आपकी शंका का समाधान किया जायेगा । तब तक आप धैर्य रखें । जब अनेक श्रोता प्रश्न पूछना चाहते हों तब उन्हें कहा जाये कि आप लोग लिखित रूप में अपने प्रश्नों को भिजवा दीजिये । वक्ता को स्वयं भी प्रश्न उठा श्रोताओं से उनका उत्तर हाँ या ना में लेना चाहिये । अपनी बात का समर्थन कराने के लिये हाथ भी उठवाये जा सकते हैं । यह ध्यान रखना चाहिये कि विवादास्पद बात या व्यक्तिगत आरोप लगाने पर शोर – शराबा हो सकता है और सारे व्याख्यान का प्रभाव धूमिल हो सकता है ।

१०. वक्ता की सफलता –

वक्ता की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपनी विचार धारा से श्रोतागण को कहाँ तक प्रभावित या सहमत कर लेता है । हिटलर के जोशीले व्याख्यानों ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी को महाशक्ति बना दिया ।

‘ तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा ‘

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के इस आह्वान पर विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीयों में नवीन रक्त का संचार हुआ और देखते ही देखते आजाद हिन्द फौज उठ खड़ी हुई ।

भारत के प्रधानमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री द्वारा दिये गये

जय जवान जय किसान ‘ उद्घोष ने भारत को अन्न उत्पादन में स्वावलम्बी बना दिया । ऐसे वक्ताओं का लोगों पर जादू के समान प्रभाव पड़ता है और वे नेता के संकेत पर अपना सर्वस्व बलिदान करने को तैयार हो जाते हैं ।

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