अनावश्यक चिंता से कैसे बचे ?

(प्रेरणा पुस्तक से डॉक्टर स्वामी देवव्रत सरस्वती)

अनावश्यक चिन्ता ( Anxiety ) से कैसे बचें ?

किसी विषय में अनावश्यक सोचना या विचार करना चिन्ता कहलाती है । अनिष्ट या अनहोनी का चिन्तन , असुरक्षा की भावना , अविश्वास , अभावों की कल्पना आदि चिन्ता के अनेक कारण है । चिन्ता एक मानसिक अनुभूति है जिसके केन्द्र में भय

ही विद्यमान रहता चिन्ता के कारण शरीर पर होने वाले दुष्परिणाम चिन्ता के कारण हृदय की धड़कन बढ़ जाती है

। रक्तचाप में वृद्धि , हृदय का डूबना , श्वास – प्रश्वास में तेजी , शरीर में पीड़ा कम्पन आदि उपद्रव प्रकट होते हैं । यदि चिन्ता अधिक बढ़ जाये तो व्यक्ति पागल के समान व्यवहार करने लगता है । चिन्तातुर व्यक्ति की निद्रा में बाधा पड़ती है । भूख कम हो जाती है । स्त्रियों का मासिक चक्र अनियमित हो जाता है । कुछ सीमा तक चिन्ता अच्छी भी है जिसके कारण व्यक्ति अपने कर्त्तव्य कर्मों को सावधानी से करता है । परन्तु अनावश्यक चिन्ता अनेक उपद्रव उत्पन्न कर व्यक्ति की जीवन शैली को कुण्ठित कर देती है । नीचे कुछ सूत्र दिये जाते हैं जिन के अनुसार आचरण करने से अनावश्यक चिन्ता से छुटकारा मिलेगा –

१. आज का काम कल पर न छोड़ें –

कल करे सो आज कर आज करे सो अब । पल में प्रलय होयेगी फेर करेगा कब ॥

जो कार्य आज करना है , सोने से पहले उसकी सूची और योजना बना लें । महत्त्वपूर्ण कार्य को पहले कर लेने से चिन्ता कम हो जायेगी । कार्यालय की फाईल घर पर न लायें । आज का काम कल पर छोड़ देने से कार्य का दबाव बढ़ जाता है । किसी कार्य को बहाना बना कर टाले नहीं ।

२. सोने और जागने का समय निश्चित करें

समय पर सोने और प्रात : काल जल्दी उठने वाले व्यक्ति के सभी काम समय पर पूरे हो जाते हैं । मन में उत्साह और शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है । प्रातः काल समय पर जागने के लिये सायं काल समय पर सो जाना चाहिये । जो व्यक्ति सूर्योदय तक सोता रहता है सूर्य की किरणें उसके ओज , बल , बुद्धि का हरण कर लेती है । ब्रह्म मुहूर्त्त का शान्त वातावरण , शीतल वायु शरीर एवं मन दोनों को शान्त एवं उत्साहित बनाये रखता है । नित्य कर्मों से निवृत हो कर खुली वायु में व्यायाम भ्रमण , योगासन प्राणायाम

करने वाले की चिन्ता भाग जाती है ।

३. अधिक चिन्ता होने पर लम्बा और गहरा श्वास प्रश्वास करें-

यह प्रयोगों से प्रमाणित हो चुका है कि जब आप लम्बा श्वास छोड़ते हैं तो सभी प्रकार के मानसिक तनावों से छूट जाते है । प्रतिदिन अनुलोम विलोम और बाह्य प्राणायाम से मन शान्त हो जाता है । इसी भांति योगासन भी नाड़ी तन्त्र पर शान्त प्रभाव डालते हैं । प्रातःकालीन भ्रमण , व्यायाम और कोई खेल खेलना भी उपयोगी है ।

४. जो कार्य आपकी सीमा से बाहर है उसे करने का विचार छोड़ दो

किसी भी कार्य को करने से पहले अपना सामर्थ्य , साधन और अनुकूल स्थिति का मूल्यांकन कर लेना आवश्यक है । हाथी

यदि पहाड़ से टकरायेगा तो उसके दन्त भंग होंगे ही । यद्यपि इसके अपवाद भी देखे । जाते हैं । दृढ़ संकल्प से किसी कार्य में जुट जाने पर उसमें सफलता भी मिलती है परन्तु जो कार्य आपकी सीमा से बाहर है उसमें उलझ जाना अपने समय और ऊर्जा का दुरुपयोग ही माना जायेगा । यदि आपने दृढ़ निश्चय कर लिया है तो फिर निश्चिन्त होकर उसमें लग जाईये । फल ईश्वराधीन है । आपका कार्य पूर्ण पुरुषार्थ करना है । याद रखो

तेते पांव पसारिये जेती लाम्बीसौर ।

५. सदा अपने कार्य में व्यस्त रहो –

खाली मन में ही अनावश्यक चिन्ता के भाव उत्पन्न होते हैं । जो अपनी दिनचर्या और दैनिक कार्यो मे संलग्न रहता है उसे खुल कर भूख लगती है । गाढ़ निद्रा आती है और अनावश्यक बातों के लिये समय ही नहीं मिलता । खाली मन शैतान का घर होता है । यदि आपके पास करने को कार्य नहीं है तो किसी सामाजिक संस्था के साथ जुड़कर सेवा के कार्यों में भाग लेना चाहिये । किसी रोगी , दीन , दु:खी एअसहाय की सहायता करने से मन को जो शान्ति मिलेगी उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता ।

६. अनावश्यक हवाई किले बनाना या दिवास्वप्न देखना अनुचित है-

इस विषय में शेखचिल्ली की कथा सुनाना उचित रहेगा । किसी ग्राम में एक घी के व्यापारी ने घी खरीदा । नगर में जाने के लिये उसने शेखचिल्ली नाम के युवक से कहा तुम यह घी का घड़ा लेकर चलो । तुम्हें चार आने पारिश्रमिक मिलेंगे । व्यापारी मन में यह सोचता हुआ जा रहा था कि इस घी का विक्रय कर मुझे एक रुपया लाभांश मिलेगा । दस रुपये सेठ को दूंगा । ऐसे दश फेरों में दस रुपये हो जायेंगे । इसी भांति दस से सौ , एक सहत्र , लक्ष , करोड़ रुपयों से कोठियाँ खरीद कर राजाओं के समान ठाट – बाट से रहूँगा इधर शेखचिल्ली ने विचार किया कि चार आने की रूई लेकर उसका सूत कात कर बेचने से मुझे आठ आने मिलेंगे । फिर आठ से एक रुपया हो जायेगा । वैसे ही दो रुपये होंगे । उनको बेच कर बकरी लूंगा । जब उसके बच्चे होंगे तो उन्हें बेच कर गाय खरीदूंगा । गाय से भैंस और भैंसे से घोड़ी और घोड़ी से हथिनी लूंगा । उन्हें बेच के दो बीबियों से शादी करूंगा । एक का नाम प्यारी और दूसरी का बेप्यारी रखूंगा । जब प्यारी के बच्चे गोद में बैठने को आयेंगे तो कहूँगा आओ बैठो । और जब बेप्यारी के बच्चे गोद में बैठने का आग्रह करेंगे तो मैं कहूँगा नहीं नहीं । ऐसा कह कर सिर हिला दिया । घड़ा भूमि पर गिर कर फूट गया । घी को भूमि पर बिखरा देख व्यापारी रोने लगा और शेखचिल्ली भी रोने लगा । उसने शेखचिल्ली को धमकाया कि घी गिरा कर रोता क्यो हैं । मैंने तो दश रुपये उधार लेकर घी खरीदा था । मेरा सारा करा कराया बिगड़ गया शेखचिल्ली ने कहा तेरी तो केवल दश रुपये की हानि हुई और मेरा तो बना बनाया घर ही बिगड़ गया । इसी लिये हवाई किले बनाना और दिवास्वप्न देखना छोड़ वर्तमान में ही जीने का विचार उचित है ।

७. पूर्ण पुरुषार्थ करो परन्तु फल के विषय में अनावश्यक चिन्तन करना या सोचना उचित नहीं है –

गीता कहती है- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है फल में नहीं । फल प्राप्ति ईश्वराधीन है । आम बोने वाले को आम और बबूल बोने वाले को कांटे ही मिलेंगे । ईश्वर के यहाँ देर है पर अन्धेर नहीं । इसे निष्काम कर्म करना कहते हैं । जिसमें फल की आकांक्षा को त्याग केवल कर्त्तव्य कर्मों को करते जाना है ।

८. अपने दुःखों की चर्चा दूसरों से न करो

अपने दुःखों को दूसरों के सामने बढ़ा कर कहने वाला व्यक्ति दु:खों को स्वीकार कर लेता है । इससे चिन्ता बढ़ेगी घटेगी नहीं । इधर दूसरे लोग सुनकर उपहास या उपेक्षा करेंगे । जीवन में सुख – दुःख आते ही रहते हैं । दिन के पश्चात् रात्रि और फिर सूर्योदय होता है । जो दुःख वर्तमान में है उसे सदा रहना नहीं । याद रखो रात कटेंगी होंगे उजाले फिर मत गिरना ओ गिरने वाले । इन्साँ उसको कहते हैं जो संमले और संभाले ।

९ . कार्य को टुकड़ो में बाँट कर करना चाहिये

कई बार किसी बहुत बड़े और परिश्रम साध्य कार्य को देख कर व्यक्ति के हाथ – पैर फूल जाते हैं । ऐसे समय कर्त्तव्य पथ से विचलित न होकर कार्य को टुकड़ों में बाँटना और फिर एक भाग को पूरा करके फिर दूसरे भाग को करना चाहिये । ऐसा करने से हँसी खुशी से सारा कार्य पूरा हो जायेगा । किसी कठिन कार्य में जो कार्य सरलता से किया जा सके उसे पहले कर लेने से फिर कठिन कार्य भी सरल दिखाई देने लगेगा । याद रखो गहरे पानी में डुबकी लगाने से ही मोती मिलते हैं ।

१०. चुनौतियों को स्वीकार करो –

वह पथ क्या पथिक कुशलता क्या ,

जिसमें बिखेर हुये शूल न हो ।

नाविक की धेर्य परीक्षा क्या ,

जब धारा ही प्रतिकूल न हो ।।

डुबाये जो सफीनों को उसे तूफान कहते हैं ।

जो तूफानों से टक्कर ले उसे इन्सान कहते हैं ।।

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