अवसाद (depression) से बाहर कैसे आयें ?

प्रेरणा पुस्तक से डॉक्टर स्वामी देवव्रत सरस्वती आर्य वीर दल अध्यक्ष. aryaveerdal.in

अवसाद ( Depression ) से बाहर कैसे आयें ?

अवसाद

से पीड़ित व्यक्ति दु : खी , उदास , निरुत्साहित शंकालु और चिन्तित दिखाई देता है । आन्तरिक और बाह्य दोनों कारणों से अवसाद उत्पन्न होता है ।

आन्तरिक कारण

१. कार्य में असफलता –

किसी कार्य में सफल नहीं होना परीक्षा में कम अंक या अनुत्तीर्ण हो जाना , व्यापार में घाटा होना ।

२. मानसिक आघात –

किसी प्रियजन की मृत्यु दुःखद समाचार , अनहोनी घटना दुर्घटना आदि से मन को एकदम सदमा या आघात लगना ।

३. मन की विक्षिप्तता –

विक्षिप्त मन में कभी पागलपन , निराशा , विचित्र व्यवहार , झूठा आत्मविश्वास जैसे मैं बड़ा विद्वान् नेता , सिद्ध पुरुष हूँ , अपराध की भावना , चिन्ता , शंका , थकान तथा निद्रा की कमी दिखाई देती है ।

४. दुःखों की अनुभूति-

जिससे आहत होकर प्राणी उससे द्वेष या बचना चाहता है उसे दु : ख कहते हैं । उनको स्मरण करने से वह पुनः पुन : मन को व्यथित करता है ।

५. निराशा के विचार –

जब अपनी क्षमताओं और सम्भावनाओं तथा किये हुये पुरुषार्थ का उचित फल या आकांक्षा के अनुकूल परिणाम नहीं निकलता तब व्यक्ति में निराशा के विचार आते हैं ।

१. आनुवंशिकता –

जिसके माता – पिता या अन्य सदस्य अवसाद ग्रस्त होते हैं तो उनकी सन्तानों में भी इसके लक्षण प्रकट हो सकते हैं परन्तु यह अनिवार्य नहीं है । उत्साह वाला वातावरण , सक्रिय जीवन नियमित दिनचर्या , सन्तुलित आहार , व्यायाम , खेल आसन – प्राणायाम

इत्यादि जिसके जीवन के अंग बन गये हैं वह किसी भी आधात को सहन करने का सामर्थ्य रखता हैं । परन्तु यदि कोई व्यक्ति अवसाद से ग्रस्त लोगों के पास रहता है तो उसमें भी ये लक्षण प्रकट हो सकते हैं । जिसका जीवन आशा , उल्लास और उत्साह वाला है उसे अवसाद का भय नहीं होता ।

२. शारीरिक विकलांगता

यदि कोई व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से अक्षम या विकलांग है और कुछ बड़ा कार्य करने की इच्छा परन्तु शारीरिक विकलांगता के कारण उसके सपने पूरे नहीं हो पाते तो इस असमर्थता के कारण वह अवसाद से घिर जाता है । वह सोचता है यदि आज मेरे हाथ – पैर ठीक हुये होते तो मैं अमुक दोड़ में प्रथम स्थान प्राप्त करता और मेरे गले में भी अनेक पदक सुशोभित होते । परन्तु यह एक पहलू है । जिसके मन में कुछ करने की उत्कण्ठा है वह कोई न कोई मार्ग निकाल ही लेता है । बिना दोनों हाथों के पैरों से लिखना

तथा अन्य कार्य कर लेने वाले व्यक्ति भी देखे गये हैं । पैरों से विकलांग व्यक्तियों ने एवरेस्ट के शिखर पर विजय पताका फहराई है । मन के हारे हार है मन के जीते जीत । प्राय देखा जाता है कि किसी अंग से विकलांग हो । जाने पर भी व्यक्ति दूसरी इन्द्रियों पर आधिपत्य कर असम्भाव्य कार्यो को कर दिखाता है । यद्यपि उसे विकलांग होने के कारण अनेक कठिनाईयों से दो – दो हाथ करने पड़ते हैं परन्तु ईमानदारी से कार्य करने पर लोगों की सहानुभूति उस से जुड़ती चली जाती है ।

३. निद्रा की कमी –

आहार , निद्रा , ब्रह्मचर्य ये

शरीर के तीन आधार स्तम्भ हैं । व्यक्ति का बल , पराक्रम और स्वास्थ्य गाढ़ निद्रा पर ही आधारित है । शरीर एवं मन की थकान निद्रा से ही मिटती है । एक स्वस्थ युवक को छः सात घण्टे निद्रा लेना आवश्यक है । इसके लिये नियमित दिनचर्या होनी चाहिये । सोने से एक घण्टा पहले टी . वी .

मोबाईल आदि देखने बन्द कर देने चाहियें ।

हलका शास्त्रीय संगीत

सुन सकते हैं । भोजन सायंकाल आठ बजे तक कर लेना उचित है । सोने का स्थान वायु के आवागमन वाला शान्त और सुरक्षित होना चाहिये । मोबाईल ५-६ फुट की दूरी पर रखें । उत्तर दिशा की ओर शिर करके सोने से निद्रा बाधित होती है । में

४. नशा करना-

जितने भी मादक पदार्थ हैं वे अन्त में अवसाद जनक ही होते हैं । जैसे तांगे में चलता घोड़ा चाबुक मारने से कुछ समय तक दौड़ता है और उसके पश्चात् फिर धीरे चलने लगता है । मादक पदार्थ स्नायुमण्डल एवं हृदय की गति को बढा देते हैं जिसके कारण व्यक्ति अपने में स्फूर्ति अनुभव करता है परन्तु कुछ समय तक उनका प्रभाव रहता है और फिर पहले से अधिक थकान और अवसाद आ जाता है । इन से छुटकारा पाने के लिये किसी भी प्रकार का नशा न करने का दृढ़ संकल्प करना नशा करने वाले लोगों से दूर रहना ही श्रेष्ठ उपाय है ।

योग के आसन , प्राणायाम , ध्यान

का अभ्यास करने से शरीर में समत्व आकर धीरे – धीरे नशा करने की आदत छूट जाती है ।

धूम्रपान , मद्यपान , अफीम , हीरोईन

आदि की आदत युवक एवं युवतियों में बढ़ती जा रही है जो चिन्ता का विषय है ।

५. पर्यावरण-

भीड़ वाला वातावरण , तंग मकान , सुविधाओं का अभाव , यातायात के साधनों की कमी ,

गलत लोगों का पड़ोस आदि मन को विक्षिप्त करने के कारण हैं । इसी भांति सूर्य की धूप न मिलना , घुटन भरा वातावरण , ऋतुओं का हीनयोग अतियोग और मिथ्यायोग सभी रोगोत्पादक हैं ।

इन समस्याओं के समाधान हेतु प्रातः काल किसी खुले स्थान , पार्क या रमणीय स्थान में जाकर व्यायाम , योगासन , प्राणायाम का अभ्यास ,

उगते सूर्य की धूप का खुले शरीर से सेवन

, स्वच्छ वायु में दीर्घ श्वास का अभ्यास करना चाहिये । ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने से पर्यावरण में परिवर्तन हो गया है । वातावरण को बदलने के लिये पिकनिक , ऐतिहासिक या प्राकृतिक सौन्दर्य वाले स्थान पर कुछ समय व्यतीत करना ,

पार्कों में प्रात : काल भ्रमण , व्यायाम , आसन प्राणायाम , योगाभ्यास करना उचित है ।

अवसाद की चिकित्सा

१. परिवार एवं मित्रों के संग समय बितायें –

व्यक्ति के सब से विश्वस्त उसके परिवार के सदस्य या मित्र ही होते हैं जिनके सामने वह अपनी बात खुल कर कह सकता है । परिवार की अपेक्षा मित्रों के सम्मुख वह अपनी गोपनीय बात भी कर सकता है । अपनी समस्या बतला कर व्यक्ति अपने को हलका महसूस करता है । हितैषी जन उसकी समस्या को जान कर उसे आवश्स्त करते या उसे सुलझाने का मार्ग बतला देते है । अवसाद ग्रस्त व्यक्ति अपने आप को अकेला समझने लगता है । वह सोचता है कि संसार में मेरा कोई हितैषी नहीं है । ऐसे समय उसे आश्वासन देने की आवश्यकता है । मित्रों के साथ , भ्रमण , मनोरंजन , नृत्य , गीत

आदि से उसकी मानसिकता बदल जायेगी और परिवार के लोगों की सहानुभूति पाकर उसका मनोबल बढ़ जायेगा ।

२. सामाजिक गतिविधियों में भाग लें-

व्यक्ति का विकास समाज में ही होता है । अवसाद से छुटकारा पाने के लिये समाज सेवा एन . सी . सी . स्काऊट , किसी मेले , उत्सव , तीर्थ स्थानों में प्रबन्ध व्यवस्था सहयोग राष्ट्रिय सेवा योजना , ग्रीष्मकाल में रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को – पानी पिलाना , निर्धन विद्यार्थियों को पुस्तक , गणवेश वितरण , प्राकृतिक आपदा- भूकम्प , बाढ़ , अकाल

आदि में लोगों को भोजन एवं अन्य सामग्री का वितरण आदि बहुत से सामाजिक कार्य हैं जिनमें भाग लेने से मनोवृति बदल जाती है । इसी भांति सामाजिक गतिविधियां – मिलकर दर्शनीय स्थानों का भ्रमण , खेल , संगीत , नाटक आदि भी बहुत सहयोगी हैं । जब अवसाद ग्रस्त व्यक्ति हँसते , गाते , मनोरञ्जन करते हुये साथियों को देखता है तो सारा विषाद या आघात दूर भाग जाता है ।

३. कुछ नया कार्य करने का निश्चय करें-

पानी के मार्ग में यदि सामने चट्टान या अवरोधक उपस्थित हो जाता है तो वह दाहिने या बांये से अपना मार्ग बना आगे निकल जाता है और धीरे – धीरे अवरोधक भी हटता जाता है । इसी भांति किसी कार्य में अपेक्षा के अनुसार सफलता न मिले अथवा बाधा उत्पन्न हो जाये तो और दूसरा कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है । वह कार्य एकदम नवीन और अधुनातन हो तो सोने पे सुहागा है । जिस कार्य में आपकी रुचि है उसे अपना शौक या हॉबी बनायें । टिकटों का संग्रह , सिक्के , पुरानी मुद्रायें , देशी – विदेशी कलाकृतियां , चित्रकला , सुन्दर सुगठित शरीर का निर्माण , खेल कूद में भाग लेना

आदि अनेक ऐसे कार्य हैं । जिनमें आप अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं । परमात्मा ने आपको बहुत सारी क्षमताओं के साथ भेजा है । उन्हें पहचान कर उनका विकास करना आपका उत्तरदायित्व है । संसार में अनेक ऐसे व्यक्ति हुये हैं जो जीवन के प्रारम्भिक वर्षों में सामान्य बुद्धिमान थे परन्तु आगे जाकर उन्होंने अनेक उल्लेखनीय कार्य , आविष्कार और साहसिक कार्य कर लोगों को आश्चर्य चकित कर दिया । विद्यार्थी जीवन में अध्यापकों ने आईन्स्टीन को मन्दबुद्धि घोषित कर दिया था ।

४. अपने विशेष गुण और सफल कार्यों की सूची बनायें-

प्रत्येक व्यक्ति कुछ विशेष गुण लेकर आया है । ‘ जीवन् नरो भद्र शतानि पश्येत् ‘ व्यक्ति के जीवन में अनेक सुखद सुअवसर भी आते हैं । सुख – दुःख चक्रवत् भ्रमण करते हैं । आपकी जो अविस्मरणीय घटनायें या प्रसंग हैं जिन में आपकी प्रशंसा या जय – जयकार हुआ हो उनकी सूची बनायें । कक्षा में अंकों का प्रतिशत , किसी खेल , नाटक या दूसरी प्रतियोगिताओं में पुरस्कार , साथियों संग भ्रमण , मनोरंजन , घर में विवाह या दूसरे प्रसन्नता के क्षणों में प्राप्त आनन्द , मित्रों संग आमोद – प्रमोद आदि अनेक आनन्द के अवसर आये हैं उनकी सूची बनायें । इसी भांति आप में ऐसे कोन से गुण हैं जो दूसरों से विशेष हैं इन सबका लेखा बन दूर हो जायेगी । जाने पर जब आप उनकी वीडियो या स्मरण करेंगे तो हताशा स्वयं ही दूर हो जाएगी ।

५. प्रति दिन व्यायाम करें –

एक व्यायाम अनेक रोगों की दवा है । व्यायाम करने से मस्तिष्क में शुद्ध रक्त का संचार होकर अनेक मानसिक रोग ठीक हो जाते हैं । व्यक्ति की ऊर्जा व्यायाम द्वारा शरीर में ही रच- खप जाती है । वह विक्षिप्त नहीं करती । व्यायाम से भूख खुल कर लगती है और गाढ़निद्रा आती है । कब्ज नहीं रहती । व्यक्ति में नवीन उत्साह , स्फूर्ति और सुविचार आते हैं । शरीर सुडौल , सुगठित और मुख पर ओज तेज देखकर सभी दुर्विचार , निराशा , मानसिक आघात दूर होकर नवीन आशा का संचार होता है । सैरीटोनिन और टेस्टेस्टेरौन हार्मोन का उत्सर्जन होने से मस्तिष्क शान्त रहता है ।

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