युवक में बढ़ता तनाव समस्या एवं समाधान

प्रेरणा पुस्तक से – डॉक्टर स्वामी देवव्रत सरस्वती

युवकों में बढ़ता तनाव समस्या एवं समाधान

वर्तमान भौतिक और यान्त्रिक युग में सर्वत्र स्पर्धा का प्राधान्य है और व्यक्ति रोजी , रोटी तथा अस्तित्व की लडाई लड़ रहा है । नई जिम्मेदारियों की समस्या , अनुभव की कमी और समाज में अपने आपको सबसे अच्छा दिखाने की भावना के कारण युवकों को सब से अधिक तनाव सहन करना पड़ रहा है । तनाव व्यक्ति एवं परिस्थियों के मध्य होने वाले क्रिया और प्रतिक्रिया का आदान – प्रदान मात्र है । इस स्थिति में व्यक्ति Fighr or Flight अर्थात् परिस्थिति का मुकाबला करता है अथवा वहां से पलायन करने का उपाय सोचता है । इस पलायन के फलस्वरूप वह हताशा और निराशा से घिर जाता है । समान्य रूप में युवावर्ग में तनाव के निम्न कारण हैं

१. परीक्षा में कम अंक आना अथवा प्रतियोगी परीक्षा में अनुतीर्ण हो जाना –

प्रत्येक माता – पिता की यह इच्छा रहती है कि उनके बच्चे परीक्षा में अधिक से अधिक अंक प्राप्त करें जिससे उन्हे इंजीनियर , डाक्टर , सिविल सर्विस आदि में प्रवेश मिल सके । बच्चों को आगे बढ़ने के लिए उन्हें प्रेरित करना कोई बुरी बात तो नहीं है परन्तु सभी बच्चे कुशाग्र बुद्धि वाले नहीं होते । ऐसे समय माता – पिता का यह कर्तव्य बनता है कि वे बच्चों पर अनावश्यक दबाव न डालें । व्यक्ति का जीवन केवल परीक्षा के अंको के आधार पर नही चलता । प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति प्रदत्त गुण भी मिले हैं जिनका विकास कर वह सम्मानपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है ।

२. प्रेम में असफलता – आज सर्वत्र पश्चिम की अपसंस्कृति का प्रचार – प्रसार हो रहा है जिसके कारण युवक और युवतियां जीवन निर्माण के स्थान पर जीवन ऊर्जा को समय से पहले ही क्षीण करने की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं । यह प्रवृत्ति उन्हें पतन की ओर ले जाने वाली है । आजकल जिसकी गर्लफ्रेण्ड और ब्वायफ्रेण्ड नहीं है उसे निरा बुद्धू समझा जाता है ।

प्रेम और वासना में अन्तर है । प्रेम आन्तरिक अनुभूति है और वासना शारिरिक भूख है । प्रेम में समर्पण तथा वासना में स्वार्थ की प्रधानता रहती है । माता पिता एवं गुरुजनों का यह कर्तव्य है कि वे युवकों का मार्गदर्शन करें और उन्हें समझाये कि समय से पहले किया गया कोई भी कार्य अच्छा नहीं होता । इस समय आपको अपने भविष्य का निर्माण करने के लिए कठोर परिश्रम करना चाहिए । विवाह की आयु हो जाने पर अभिभावकों का यह कर्तव्य है कि वे लड़का , लड़की की भावनाओं का सम्मान करें । जहां तक हो सके गुण , कर्म , स्वभाव के अनुसार उन्हें अपना जीवन साथी चुनने की स्वतन्त्रता होनी चाहिए । आजकल जो प्रेम विवाह हो रहे है यह प्रवृत्ति सामाजिक परिवेश के अनुकूल नहीं है ।

३. युवावर्ग और पुरानी पीढी के विचारों में विभिन्नता भी तनाव का कारण बनती है । बड़े लोग चाहते है कि उनके बच्चे जैसा हम कहें उसी के अनुसार चलें । जहां हम उनका विवाह करें और जैसी शिक्षा दिलायें वही उचित है । जब हम उनके लिए सारी सुविधायें जुटा रहें है तो हमारी भी कुछ आकाक्षाएं है । कुछ सीमा तक उनकी बात उचित हो सकती है परन्तु सर्वांश में नहीं । बच्चों की अपनी रुचि और क्षमता का भी ध्यान रखना उचित है । उन पर अधिक दबाव डालने पर वे आपकी बात को अनसुना कर स्वैच्छिक वृत्ति वाले बन जाते हैं और स्वयं भी तनाव में रहते हैं । कुछ सूत्र और भी है जिनकी ओर माता – पिता को ध्यान देना चाहिए

1 शास्त्रों में कहा है कि जब बालक सोलह वर्ष का हो जावे तब उसके साथ मित्रवत् व्यवहार करना उचित है ।

२. युवा हो जाने पर बच्चें सारी बात अपने माता – पिता को नहीं बतलाते । इस स्थिति में यदि उन्हें कोई मानसिक परेशानी है तो माता – पिता बच्चों को विश्वास में लेकर उनके विचारों को जान उनका समाधान करें अथवा मित्रों से सूचना प्राप्त कर यथोचित उपाय करने का प्रयत्न करें ।

३. माता – पिता का कर्त्तव्य बनता है कि जो बातें वे अपने बच्चों से कहते हैं कि ऐसा करो आदि वे उनके जीवन में यदि नहीं हैं तो ऐसा व्यक्ति अपने बच्चों को किस आधार पर उन्हें रोक पायेगा ।

४. माता पिता अपने बच्चों को सदा प्रोत्सहित करते रहें तथा उच्च आदर्श , पुरुषार्थ एवं सत्य व्यवहार की प्रेरणा दें । वे उनकी क्षमताओं को बतलायें और उन्हें विकसित करने मे पूरा सहयोग करें । तनाव या डिप्रेशन को दूर करने में युवकों को स्वयं भी प्रयत्न करना चाहिये ।

१. अपनी दिनचर्या में परिवर्तन करें । प्रातः काल शीघ्र जागकर नित्य कर्मों से निवृत्त हो व्यायाम , आसन , प्राणायाम और ध्यान

करने से निराशामय वातावरण बदल जाता है । सायंकाल खेलकूद और परिवार या मित्रों के साथ मनोरंजन करना भी तनाव को पर्याप्त सीमा तक दूर करता है ।

२. अपने मन की बात माता – पिता या मित्रों को बतला देने से भी मन हलका हो जाता है ।

३. आपकी जिस क्षेत्र में रुचि

और क्षमता है उसी में अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहिए । माता – पिता यदि सहमत नहीं हैं तो विनम्रतापूर्वक उन्हें अनुकूल बनाने का प्रयत्न करें ।

४. अपने सुखद भविष्य का चिन्तन करें । आजकल सभी क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा का युग है । इसके लिये आपको कठोर परिश्रम करने की आवश्यकता है ।

५. इस कच्ची आयु में प्यार की पींग बढाना , अपने आपको अत्याधुनिक या सुपरमैन दिखलाना कदापि उचित नहीं है । स्मरण रहे- ‘ सादगी सदाचार की जननी है औरशृंगार व्यभिचार का दूत है । ‘

५. यदि परिस्थितियां आपके अनुकूल नहीं हैं तो उन्हीं के अनुरूप सामञ्जस्य बिठाते हुये आगे बढ़ें । सभी वस्तुयें किसी के भी अनुकूल नहीं रहतीं । जिस पथ में कांटे न हों वह पथ ही क्या है ? धारा के प्रतिकूल होने पर ही नाविक के धैर्य की परीक्षा होती है ।

६. जब भी कमी निराशा के भाव आयें तब जिन महापुरुषों ने प्रतिकूल परिस्थियों से लोहा लिया है , उनका स्मरण करें । कुआँ खोदने वाले को पहले कीचड़ और अन्त मे निर्मल जल की प्राप्ति होती है । सोना अग्नि में तप कर ही कुन्दन बनता है ।

७. लोक में कहावत है – ‘ तेते पाँव पसारिये जेती लाम्बी सौर ‘ आप कोई बड़ा कार्य करना चहाते हैं तो पहले अपने संसाधन , सामर्थ्य और मित्रजनों की सहायता कितनी मिलेगी इसका चिन्तन अवश्य ही कर

८. जीवन में सफलता और असफलता दोनों ही मिलती है । असफलता भी एक कदम आगे बढने की सीढी है । यत्ने कृतेऽपि यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः । प्रयत्न करने पर भी यदि कोई कार्य सिद्ध नहीं होता तो देखें । कि कहाँ कमी रह गई । उसे दूर कर फिर से उत्साह पूर्वक कार्य प्रारम्भ करें ।

9 व्यक्ति कर्म करने में स्वतन्त्र है । फल ईश्वराधीन है । कई बार दुष्ट प्रकृति के लोग भी अड़चन डाल देते हैं । इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार का बोलबाला आपकी योग्यता को दबा लेता है । यह समाज की विसंगति है । आपको उस समय भी हतोत्साहित नहीं होना चाहिए । बाधायें कब रोक सकी हैं आगे बढ़ने वाले को ।

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